लोंगेवाला-बहादुर सैनिकों की गौरवपूर्ण कहानी

हमारा तिरंगा हवाओं से नही लहराता , वह लहराता है हर उस वीर सैनिक की आखिरी सांस से जिसने इसकी हिफाजत के लिए अपने आप को कुर्बान कर दिया इसीलिये आज हम कहते है जय हिन्द जय हिंद की सेना।

भारतीय सैनिक के लिये अपना वतन सब कुछ है और जब बात देश की आये तो परिवार , घर , बच्चे सब बहुत छोटे हो जाते है ।

इस ब्लॉग में में बताने जा रहा हु कुछ ऐसे ही बहादुर सैनिकों की गाथा जिन्होंने अपने शोर्य से दिखा दिया कि ताकत वतन की हम से है , हिम्मत वतन की हमसे है और जब तक हम जिंदा है यह देश सुरक्षित है ।

लोंगेवाला की गाथा कुछ ऐसे ही बहादुर सैनिकों की गाथा है जिन्होंने अपने शौर्य से दुश्मन के छक्के छुड़ा दिए ।

लोंगेवाला की कहानी

भारत पाकिस्तान युध्द के समय पाकिस्तान ने लोंगेवाला की ओर कूच किया वे यहाँ से होते हुए जैसलमेर जाने वाले थे । उस वक्त लोंगेवाला चेकपोस्ट सिर्फ 90 जवानों की निगरानी में थी। कंपनी के 29 जवान और लेफ्टिनेंट धर्मवीर इंटरनेशनल बॉर्डर की पैट्रोलिंग पर थे। देर शाम उन्हें जानकारी मिली कि दुश्मन के बहुत सारे टैंक एक पूरी ब्रिगेड के साथ लोंगेवाला पोस्ट की तरफ बढ़ रहे हैं। उस ब्रिगेड में 2 हजार से ज्यादा जवान रहे होंगे। कुछ ही पलों बाद लश्कर का सामना भारत की सेना की छोटी सी टुकड़ी के साथ करना था। न जमीनी न हवाई किसी तरह की मदद उस दौरान मिलना संभव नहीं था।

भारतीय सेना के जवान मुंहतोड़ जवाब के लिए तैयारी में लग गए। कुछ ही देर बाद पाकिस्तानी टैंकों ने गोले बरसाते हुए भारतीय पोस्ट को घेर लिया। वे आगे बढ़ते जा रहे थे और उनके पीछे पाकिस्तानी सेना। भारतीय सेना ने जीप पर लगी रिकॉयललैस राइफल और 81एमएम मोर्टार से जवाबी कार्रवाई शुरू कर दी। शुरुआती कार्रवाई इतनी दमदार थी कि पाकिस्तानी सेना ने कुछ दूरी पर रुककर जंग लड़ने का फैसला किया। पाकिस्तानी हज़ार से ज्यादा थे और भारतीय 100 से भी कम। वो रात इम्तिहान की रात थी। शैलिंग के थमते कुछ सुनाई दे रहा था तो गूंज रहे शब्द ‘जो बोले सो निहाल सत श्री अकाल।’

,(फ़ोटो- जीप के ऊपर से इसी के द्वारा पाकिस्तानी सेना पर हमला किया गया था।)

रात होते होते अब तक भारत की छोटी सी टुकड़ी ने दुश्मन के 12 टैंक तबाह कर दिए थे। रातभर गोलीबारी जारी ही थी कि इंडियन एयरफोर्स से मदद मिल गई। दो हंटर विमानों ने पाकिस्तानियों के परखच्चे उड़ा दिए। वे बौखलाए टैंक लेकर इधर-उधर दौड़ने लगे। सुबह के बाद तक हम पाकिस्तानी सेना को उन्हीं की हद में 8 किलोमीटर अंदर तक खदेड़ चुके थे।

जैसलमेर एयरबेस पर उस वक्त सिर्फ 4 हंटर एयरक्राफ्ट और सेना के ऑब्जर्वेशन पोस्ट के दो विमान थे। हंटर एयरक्राफ्ट रात के अंधेरे में हमला नहीं कर सकते थे। अब इंतजार सुबह का था। अल सुबह ही 2 हंटर विमान लोंगेवाला की तरफ निकल पड़े। उस वक्त रोशनी इतनी कम थी कि आसमान की ऊंचाई से जमीं का अंदाजा लगा पाना मुश्किल था। तब न तो नेविगेशन सिस्टम इतना मॉडर्न था और न ही कोई लैंडमार्किंग थी।ऐसे में दोनों विमान जैसलमेर से लोंगेवाला तक जाने वाली सड़क के रास्ते को देखते हुए आगे बढ़े थे और धूल के गुबार में छिपे पाकिस्तानी टैंकों को निशाना बनाया था।

5 दिसंबर के दिन दुश्मन को खदेड़ते हुए पाकिस्तान के अंदर 8 किलोमीटर तक जा घुसे थे भारतीय सैनिक। 16 दिंसबर तक सैनिकों वहीं पर डेरा जमाए रखा। वहीं खाना बनता और वहीं पर खाते। जबकि पाकिस्तानी बिग्रेड इस इरादे के साथ भारत की ओर बढ़ी थी कि 5 दिसंबर को उनका नाश्ता लोंगेवाला में होगा, दोपहर का खाना रामगढ़ में और रात का खाना जोधपुर में। 16 दिसंबर तक भारत ने जंग जीत ली।

चेकपोस्ट के पास जवानों ने एक 10 बाय 10 का मंदिर बना रखा था। जंग में बुरी तरह क्षति हुई थी, चेकपोस्ट जल कर ख़ाक हो गई थी मगर मंदिर को आंच तक नहीं आई। युद्ध के बाद इंदिरा गांधी समेत तत्कालीन सेंट्रल मिनिस्टर जगजीवन राम, वीसी शुक्ला, बीएसएफ डायरेक्टर अश्वनी कुमार, राजस्थान के गवर्नर और मुख्यमंत्री सभी मंदिर को देखने आए। सभी को इस बात का आश्चर्य था कि इतने नुकसान के बावजूद मंदिर कैसे सलामत है।

(फ़ोटो-यह वो बम है जो फेंके गए पर फट्टे नही । आज भी मंदिर में रखे गए है )

वो मंदिर वर्तमान में तनोट राय मंदिर के नाम से समस्त भारतियों की आस्था का केंद्र है जो जैसलमेर में है । इस मंदिर में आरती व पूजा आज भी भारतीय सेना ही करती है ।

लोंगेवाला विजय उपरांत सेना द्वारा फहराया गया भारतीय तिरंगा।। वास्तविक फ़ोटो

यह फोटो भी लोंगेवाला का वास्तविक है

वायुसेना के एयरक्राफ्ट जिसका इस्तेमाल लोंगेवाला युध्द में पाक सेना को तबाह करने में किया गया था।

भारतीय सेना के जोश जज्बे ओर देशभक्ति के ऐसे कई उदाहरण है । हमारी सेना विश्व की मजबूत सेनाओं में आती है । कोई भी देश युद्द अपने हथियारों से नही बल्कि अपनी सेना के मनोबल से जीतता है । अमेरिका द्वारा घातक हथियार दिए जाने के बावजूद भी पाकिस्तान भारतीय सेना के मनोबल के आगे हमेशा पस्त ही हुआ है ।

सबसे युवा सिपाही अरुण खेत्रपाल को जब युद्द से पीछे हटने का आदेश मिला तब उसने कहा था कि “नो सर ,अभी मेरी बंदूक काम कर रही है और में इनको मारके रहूंगा। इन्हें बाद में परमवीर चक्र दिया गया।

आगे के ब्लॉग में ओर लिखूंगा

जय हिंद

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राजपूत – एक योद्धा 1

विश्व के इतिहास में राजपुत्तों के इतिहास के कई ऐसे पन्ने है जो अमिट है । विश्व में कई वीर योद्धा हुए लेकिन इतिहास से तालुक्क रखने वाले लोग बताये उनमें से किसके वंशज आज भी जिंदा है ओर किस दशा में है ।
राजपूत इतिहास विश्व पटल पर सबसे गौरवपूर्ण है लेकिन वीरता से ईर्ष्या रखने वाले लोग इनमें सिर्फ कमियां ही देखते है जबकि इनसे ज्यादा खूबियां भी है ।
राजपूत वीरता के यूं तो अनगिनत किस्से है लेकिन एक किस्सा में आज आपसे शेयर कर रहा हूँ ।
एक राजपूत योद्धा के लिए जीत क्या मायने रखती है इसको भलीभांति समझने लायक किस्सा है यह
इस किस्से में मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह की सेना के दो राजपूती दस्तों (रेजिमेंट) “चुण्डावत” और “शक्तावत” में अपनी श्रेष्ठता साबित करने के लिए एक मुक़ाबला होता है जो इतिहास में राजपूतों की अपनी आन, बान और शान के लिए अपने प्राण तक न्यौछावर कर देने वाली किवदंती का अमिट उदाहरण बन जाता है। तो आइए जानते है क्या है यह प्रसंग-

मेवाड़ के महाराणा अमरसिंह की सेना में ,विशेष पराक्रमी होने के कारण “चुण्डावत” खांप के वीरों को ही “हरावल”(युद्ध भूमि में अग्रिम पंक्ति) में रहने का गौरव प्राप्त था व वे उसे अपना अधिकार समझते थे। किन्तु “शक्तावत” खांप के वीर राजपूत भी कम पराक्रमी नहीं थे। उनके हृदय में भी यह अरमान जागृत हुआ कि युद्ध क्षेत्र में मृत्यु से पहला मुकाबला हमारा होना चाहिए। अपनी इस महत्वाकांक्षा को महाराणा अमरसिंह के समक्ष रखते हुए शक्तावत वीरों ने कहा कि हम चुंडावतों से त्याग,बलिदान व शौर्य में किसी भी प्रकार कम नहीं है। अत: हरावल में रहने का अधिकार हमें मिलना चाहिए।
मृत्यु से पाणिग्रहण होने वाली इस अदभूत प्रतिस्पर्धा को देखकर महाराणा धर्म-संकट में पड़ गए | किस पक्ष को अधिक पराक्रमी मानकर हरावल में रहने का अधिकार दिया जाय ? इसका निर्णय करने के लिए उन्होंने एक कसौटी तय की ,जिसके अनुसार यह निश्चित किया गया कि दोनों दल उन्टाला दुर्ग (जो कि बादशाह जहाँगीर के अधीन था और फतेहपुर का नबाब समस खां वहां का किलेदार था) पर प्रथक-प्रथक दिशा से एक साथ आक्रमण करेंगे व जिस दल का व्यक्ति पहले दुर्ग में प्रवेश करेगा उसे ही हरावल में रहने का अधिकार दिया जायेगा।

बस ! फिर क्या था ? प्रतिष्ठा की रक्षा के लिए मौत को ललकारते हुए दोनों ही दलों के रण-बांकुरों ने उन्टाला दुर्ग पर आक्रमण कर दिया। शक्तावत वीर दुर्ग के फाटक के पास पहुँच कर उसे तोड़ने का प्रयास करने लगे तो चुंडावत वीरों ने समीप ही दुर्ग की दीवार पर कबंध डालकर उस पर चढ़ने का प्रयास शुरू किया। इधर शक्तावतों ने जब दुर्ग के फाटक को तोड़ने के लिए फाटक पर हाथी को टक्कर देने के लिए आगे बढाया तो फाटक में लगे हुए तीक्षण शूलों से सहम कर हाथी पीछे हट गया।
यह देख शक्तावतों का सरदार बल्लू शक्तावत ,अदभूत बलिदान का उदहारण प्रस्तुत करते हुए फाटक के शूलों पर सीना अड़ाकर खड़ा हो गया व महावत को हाथी से अपने शरीर पर टक्कर दिलाने को कहा जिससे कि हाथी शूलों के भय से पीछे न हटे। एक बार तो महावत सहम गया ,किन्तु फिर “वीर बल्लू” के मृत्यु से भी भयानक क्रोधपूर्ण आदेश की पालना करते हुए उसने हाथी से टक्कर मारी जिसके परिणामस्वरूप फाटक में लगे हुए शूल वीर बल्लू शक्तावत के सीने में बिंध गए और वह वीर-गति को प्राप्त हो गया। किन्तु उसके साथ ही दुर्ग का फाटक भी टूट गया।

दूसरी और चूंडावतों के सरदार जैतसिंह चुण्डावत ने जब यह देखा कि फाटक टूटने ही वाला है तो उसने पहले दुर्ग में पहुँचने की शर्त जितने के उद्देश्य से अपने साथी को कहा कि “मेरा सिर काटकर दुर्ग की दीवार के ऊपर से दुर्ग के अन्दर फेंक दो।” साथी जब ऐसा करने में सहम गया तो उसने स्वयं अपना मस्तक काटकर दुर्ग में फेंक दिया।
फाटक तोड़कर जैसे ही शक्तावत वीरों के दल ने दुर्ग में प्रवेश किया ,उससे पहले ही चुण्डावत सरदार का कटा मस्तक दुर्ग के अन्दर मौजूद था। इस प्रकार चूंडावतों ने अपना हरावल में रहने का अधिकार अदभूत बलिदान देकर कायम रखा।
वर्तमान परिवेक्ष में भले ही यह आपको विश्वास को डगमगाता हो परंतु राजपूत इतिहास ऐसे कई किस्सों से भरा पड़ा है

कैसे तय होती है पेट्रोल डीजल की कीमत।

जोगराजसिंह भाटी

पेट्रोल डीजल के रेट बढ़ने की चर्चाएं हम खूब करते है और सरकारों पर आरोप ओर प्रत्यारोप भी करते है लेकिन बहस करने वालो में से 90% को असल पता ही नही होता कि रेट बढ़ते घटते कैसे है ।

आज में आपको पेट्रोल डीजल की रेट को प्रभावित करने वाले कारक व प्रक्रिया बताऊंगा ।

भारत में लगभग अस्सी फीसदी तेल का आयात किया जाता है. अंतरराष्ट्रीय स्तर कच्चा तेल प्रति बैरल के हिसाब से खरीदा और बेचा जाता है. एक बैरल में तकरीबन 162 लीटर कच्चा तेल होता है.

इसका भुगतान अधिकतर अमेरिकी डॉलर्स में करने की बाध्यता चली आ रही.

इस प्रकार के लेन-देन में कच्चा तेल खरीदने वाला, बेचने वाले से निश्चित तेल की मात्रा पूर्व निर्धारित दरों पर किसी विशेष स्थान पर लेने पर राजी होता है. यह सौदे केवल नियंत्रित संस्थाओं द्वारा ही किए जाते हैं. भुगतान रोजाना और ताजा कीमतों के आधार पर तय किया जाता है. न्यूनतम खरीदारी 1,000 बैरल की होती है.

भारत में उत्पादन करने वाली मुख्य कंपनियां हैं ऑयल इंडिया, ओएनजीसी, रिलांयस इंडस्ट्री और केयर्न इंडिया। तेल आयात करने वाली कंपनियों को ओएमसी यानि ऑयल मार्केटिंग कंपनी कहते हैं। इसमें इंडियन ऑयल कॉरपोरेशन लिमिटेड (आईओसीएल), भारत पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉरपोरेशन लिमिटेड (एचपीसीएल) प्रमुख हैं। 95 फीसदी कच्चे तेल का आयात इन्हीं तीन कंपनियों के द्वारा होता है। बाकी का हिस्सा रिलायंस और एस्सार कंपनियां आयात करती हैं।
जिस कीमत पर हम पेट्रोल खरीदते हैं उसका करीब 48 फीसदी उसका बेस यानि आधार मूल्य होता है .
इसके अलावा करीब 35 फीसदी एक्साइज ड्यूटी, करीब 15 फीसदी सेल्स टैक्स और दो फीसदी कस्टम ड्यूटी लगाई जाती है. अब यह चीजें क्या है समझिए
1.तेल के बेस प्राइस में कच्चे तेल की कीमत, प्रॉसेसिंग चार्ज और कच्चे तेल को शोधित करने वाली रिफाइनरियों का चार्ज शामिल होता है.
2.एक्साइज ड्यूटी कच्चे तेल को अलग-अलग पदार्थों जैसे पेट्रोल, डीज़ल और किरोसिन आदि में तय करने के लिए लिया जाता है.
3.सेल्स टैक्स यानी बिक्री कर संबंधित राज्य सरकार द्वारा लिया जाता है.

राज्यों द्वारा लिया जाने वाला बिक्री कर ही विभिन्न राज्यों में पेट्रोल की कीमत के अलग – अलग होने के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार है .
यही वजह है कि मुंबई में पेट्रोल दिल्ली की तुलना में महंगा है क्योंकि दिल्ली में बिक्री कर कम है और इसी वजह से अलग-अलग शहरों में तेल की कीमत भी कम-ज्यादा होती है.
विभिन्न राज्यों में ये बिक्री कर या वैट 17 फीसदी से लेकर 37 फीसदी तक है.

पेट्रोल की कीमत में कब आया बड़ा बदलाव
साल 2002 तक ओएमसी कॉस्ट प्लस फार्मुला को आधार बनाकर एडमिनिस्टर्ड प्राइस मैकेनिज्म (एपीएम) के तहत कीमत निर्धारित करती थी। यह डिमांड-सप्लाय पर आधारित नहीं था।

2002 से 2010 तक पार्शियल (आंशिक) डिरेगुलेशन किया गया।

2010 में इसे पूरी तरह से डिरेगुलेट कर दिया गया। यानि कीमत का निर्धारण मार्केट करने लगा। इसे ऑटोमैटिक प्राइस मैकेजनिज्म कहते है। अब अंतरराष्ट्रीय मार्केट प्राइस और फॉरेन एक्सचेंज रेट मिलकर तेल की कीमत तय करने लगे।

अंदाजा लगाइए कैसे पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर हो जाती है। सेन्ट्रल टैक्स एक लीटर पेट्रोल पर 21.48 रुपये लगा। राज्य सरकार ने 14.96 रुपये टैक्स लगाए। कुल मिलाकर 36 रुपये से ज्यादा तो सिर्फ टैक्स हो गए। रिफाइनरी से तेल 26.65 रुपये प्रति लीटर लगा। मार्केटिंग मार्जिन और अन्य खर्चा 4.05 रुपये प्रति लीटर लगाया गया। डीलर का कमीशन 3.24 रुपये प्रति लीटर लगा। कुल मिलाकर उस दिन दिल्ली में एक लीटर पेट्रोल की कीमत 70 रुपये प्रति लीटर हो गई।

एक आंकड़ा बताता है कि 2016 से 2017 में ओएमसी कंपनियों का प्रोडक्शन कॉस्ट घटा है, जबकि उनके मुनाफे में 58 फीसदी तक बढ़ोतरी हुई है। अकेले आईओसीएल का मुनाफा इसी साल में 17242 करोड़ हो गया है।

अगर कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत 52.36 डॉलर प्रति बैरल है, तो पेट्रोल की कीमत 23.35 प्रति लीटर पड़ता है। लेकिन वसूला जा रहा है 26.60 रुपए प्रति लीटर।

16 जून 2017 से हर रोज कीमत तय होती है। यह प्रतिदिन सुबह छह बजे निर्धारित किया जाता है।

हर राज्य में अलग-अलग दरों से वैट लगाए जाते हैं, लिहाजा पेट्रोल की कीमत हर राज्य में अलग-अलग होती है। अभी तक पेट्रोल और डीजल को जीएसटी में शामिल नहीं किया गया है। अगर जीएसटी में शामिल हुआ, तो इनकी कीमत में एकरूपता आ सकती है।

मानवता का अप्रतिम उदाहरण

कल बाज़ार में फल खरीदने गया, तो देखा कि एक फल की रेहड़ी की छत से एक छोटा सा बोर्ड लटक रहा था, उस पर मोटे अक्षरों से लिखा हुआ था…
“घर मे कोई नहीं है, मेरी बूढ़ी माँ बीमार है, मुझे थोड़ी थोड़ी देर में उन्हें खाना, दवा और टॉयलट कराने के लिए घर जाना पड़ता है, अगर आपको जल्दी है तो अपनी मर्ज़ी से फल तौल लें, रेट साथ में लिखे हैं।
पैसे कोने पर गत्ते के नीचे रख दें, धन्यवाद!!”
अगर आपके पास पैसे नहीं हो तो मेरी तरफ से ले लेना, इजाज़त है..!!

मैंने इधर उधर देखा, पास पड़े तराजू में दो किलो सेब तोले दर्जन भर केले लिये, बैग में डाले, प्राइस लिस्ट से कीमत देखी, पैसे निकाल कर गत्ते को उठाया, वहाँ सौ-पचास और दस-दस के नोट पड़े थे, मैंने भी पैसे उसमें रख कर उसे ढंक दिया।

बैग उठाया और अपने फ्लैट पे आ गया, रात को खाना खाने के बाद मैं उधर से निकला, तो देखा एक कमज़ोर सा आदमी, दाढ़ी आधी काली आधी सफेद, मैले से कुर्ते पजामे में रेहड़ी को धक्का लगा कर बस जाने ही वाला था, वो मुझे देखकर मुस्कुराया और बोला “साहब! फल तो खत्म हो गए।”

उसका नाम पूछा तो बोला: “सीताराम”
फिर हम सामने वाले ढाबे पर बैठ गए।
चाय आयी, वो कहने लगा, “पिछले तीन साल से मेरी माता बिस्तर पर हैं, कुछ पागल सी भी हो गईं है और अब तो फ़ालिज भी हो गया है, मेरी कोई संतान नहीं है, बीवी मर गयी है, सिर्फ मैं हूँ और मेरी माँ..!!
माँ की देखभाल करने वाला कोई नहीं है, इसलिए मुझे ही हर वक़्त माँ का ख्याल रखना पड़ता है”…

एक दिन मैंने माँ के पाँव दबाते हुए बड़ी नरमी से कहा, “..माँ!! तेरी सेवा करने को तो बड़ा जी चाहता है पर जेब खाली है और तू मुझे कमरे से बाहर निकलने नहीं देती, कहती है, तू जाता है तो जी घबराने लगता है, तू ही बता मै क्या करूँ?”
न ही मेरे पास कोई जमा पूंजी है।..

ये सुन कर माँ ने हाँफते-काँपते उठने की कोशिश की। मैंने तकिये की टेक लगवाई, उन्होंने झुर्रियों वाला चेहरा उठाया अपने कमज़ोर हाथों को ऊपर उठाया,
मन ही मन राम जी की स्तुति की फिर बोली..
“तू रेहड़ी वहीं छोड़ आया कर, हमारी किस्मत का हमें जो कुछ भी है, इसी कमरे में बैठकर मिलेगा।”

मैंने कहा, “माँ क्या बात करती हो, वहाँ छोड़ आऊँगा तो कोई चोर उचक्का सब कुछ ले जायेगा, आजकल कौन लिहाज़ करता है? और बिना मालिक के कौन फल खरीदने आएगा?”

कहने लगीं.. “तू राम का नाम लेने के बाद बाद रेहड़ी को फलों से भरकर छोड़ कर आजा बस, ज्यादा बक-बक नहीं कर, शाम को खाली रेहड़ी ले आया कर, अगर तेरा रुपया गया तो मुझे बोलियो!”

ढाई साल हो गए हैं भाईसाहब सुबह रेहड़ी लगा आता हूँ …शाम को ले जाता हूँ, लोग पैसे रख जाते हैं..
..फल ले जाते हैं, एक धेला भी ऊपर नीचे नहीं होता, बल्कि कुछ तो ज्यादा भी रख जाते हैं, कभी कोई माँ के लिए फूल रख जाता है, कभी कोई और चीज़!!

परसों एक बच्ची पुलाव बना कर रख गयी,
साथ में एक पर्ची भी थी “अम्मा के लिए!”

एक डॉक्टर अपना कार्ड छोड़ गए पीछे लिखा था,
‘माँ की तबियत नाज़ुक हो तो मुझे कॉल कर लेना,
मैं आ जाऊँगा, कोई ख़जूर रख जाता है, रोजाना कुछ न कुछ मेरे हक के साथ मौजूद होता है।

न माँ हिलने देती है न मेरे राम कुछ कमी रहने देते हैं, माँ कहती है, तेरे फल मेरा राम अपने फरिश्तों से बिकवा देता है।

आखिर में, इतना ही कहूँगा की अपने मां -बाप की सेवा करो, और देखो दुनिया की कामयाबियाँ कैसे हमारे कदम चूमती हैं।…
💐💐🙏

खुद से पूछे आप शेर हे या भेड़ ?

क्या आप शीप (भेड़) बनना पसंद करेंगे या शेर?

बिल्कुल शेर!!

लेकिन आपने कभी यह सोचा है की आप शेर है या शीप(भेड़)???

कडवा सच कहूँ तो ज्यादातर लोग शीप ही है ।।               वो जी तो रहे है लेकिन जिंदगी के सामने दहाड़ कर अपने उसूलों, अपने दम पर नहीं जी रहे बल्कि जिंदगी और अपने सपनों के सामने एक शीप(भेड़) की तरह घुटने टेक मिमियाते जी रहे है ।


तो जानते है की यह शीप की तरह जीना क्या है और शेर की तरह जीना क्या है । इसके लिए हमें शीप और शेर की थ्योरी समझनी होगी ।
शीप का जीवन

शीप का जीवन गड़रिये के इशारों पे चलता है, जहाँ गड़रिया ले चले वहां चलता है और दूसरे शीप की तरह ही चलता है ।
शीप के अपने कोई सपने नहीं होते, शीप की अपनी कोई मंजिल नहीं होती बस वो तो जहाँ गड़रिया ले चले वहाँ चलता है, जहाँ और शीप जा रहे है ठीक वहाँ वो भी चलता है ।
शीप के पास कोई सवाल नहीं है की वो भी वहां जाए तो क्यों जाए और न जाए तो कहा जाए, वो तो बस दूसरे शीप को देख के सर झुकायें अंधभक्त की तरह पीछा किये जाता है और अगर वो अपनी ऐसी परिस्थितियों से दुखी हो जाता है तो ज्यादा से ज्यादा मिमिया लेता है और फिर से उसी तरह जीने लगता है ।
न तो आँखों में कोई सपने (Dreams) है, न ही जिंदगी जीने का जोश और जुनून बस एक के पीछे एक चले जा रहा है ।
अब बात करते है एक शेर की,
शेर का जीवन

शेर का कोई मालिक नहीं होता वो खुद ही अपना मालिक है शेर एक योद्धा की तरह जीता है जब तक जीता है अपने उसूलों पे जीता है अपने दम पर जीता है ।
उसे कोई चला नहीं सकता क्योंकि वो जंगल का राजा है वो अपनी मर्जी का मालिक है जो दिल में आये वही करता है ।
शेर अगर किस भी परिस्थितियों से परेशान है तो वो मिमियाता नहीं बल्कि शेर दहाड़ कर लड़ता है, ज्यादातर परेशानियां तो उसकी दहाड़ सुनकर ही भाग जाती है ।
शेर अपने शिकार का सपनों की तरह चेज (पीछा) करता है, उसके लिए लड़ता है और अपनी मंजिल खुद तय करता है इसलिए वो राजा है जंगल का और अपने दिल का भी ।
शेर की आँखों में जुनून होता है, दहाड़ में आत्मविश्वास और जिंदगी अपने उसूलों पर जीने का हौसला होता है ।
अब देखते है की यह थ्योरी से हम कैसे जुड़े हुए है ।
क्या हम भी शेर है?
एक्चुअली इंसान इस थ्योरी की तरह ही जी रहा है, जैसे या तो वो शेर है या शीप ।
कुछ लोग शीप की तरह है तो कुछ लोग शेर की तरह है ।
लेकिन देखे तो शीप ज्यादा है शेर कम ।
शीप वो सब है जो अपने दिल की नहीं सुनते और बस लोगो को देख देख कर ही आगे बढ़ रहे या जो और लोग बोल रहे वही कर रहे है ।
शीप वो है जिनके पास कोई मंजिल ही नहीं है और नहीं कोई सपने है । और अगर सपने है भी तो इसके पीछे भागने की हिम्मत नहीं है ।
सपने छोड़ दिए है अंदर से मर चुके है परिस्थितियों को स्वीकार कर लिया है, किसी ने कहा की यह तो नामुमकिन है इसलिए हार मान चुके है ।
शीप वो है जो कुछ विफलताओं से फड़फड़ा उठे है और प्रयास करना छोड़ चुके है ।
शीप वो लोग है जिनका जीवन अपने कंट्रोल में नहीं है, जो अपने हिसाब से नहीं दूसरों के नजरिये से जी रहे है वो बस अंधो की तरह वो किये जा रहे जो उन्हें पसंद नहीं लेकिन सब कर रहे इसलिए वो भी कर रहे है ।
ऐसे लोगो का जीवन बस गडरिये के भरोसे चल रहा है पता नहीं कहा जा रहे है क्यों जा रहे ।
और कुछ लोग शेर की तरह होते है जो बस अपने ही दिल की सुनते है, अपने हिसाब से चलते है उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता और क्या कर रहे है या क्या सोच रहे है वे तो बस तूफ़ान की तरह अपनी मस्ती में चल रहे है वे आते है और रिकॉर्ड तोड़ जाते है ।
वे सपने देखते है, अपनी मंजिल ढूंढते है और पूरे जोश जुनून से जैसे एक शेर अपने शिकार का पीछा करता है ठीक वैसे ही ये लोग अपने सपनों का पीछा करते है और जब तक इसे धर दबोच ना ले तब तक रुकते नहीं ।
चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत क्यों न हो लेकिन यह अपना सर नहीं झुकाते, हार नहीं मानते और नहीं मिमियाते है बल्कि आँखों में जुनून और बाहों में ज्वाला सा जोश भरकर लड़ते है और राजा बन जाते है ।
वह शेर नरेन्द्र मोदी है, वह शेर हे सचिन तेंदुलकर है, वह शेर थे अब्दुल कलाम , वह विराट कोहली है, वह दशरथ मांझी है, वह संदीप महेश्वरी है वह मैरी कॉम है, वह हर एक वो व्यक्ति है जो अपने सपनों के लिए लड़ रहा, वह हर एक वो व्यक्ति है जो अपने दिल से जी रहा है ।

आपका जीवन

  1. तो क्या आप भी सपने देख रहे है?
  2. क्या आप भी अपने दिल की बात सुन रहे है?
  3. क्या आप भी 50 बार गिर कर भी खड़े हो रहे है?
  4. क्या आप भी परिस्थितियों को चीर कर आगे बढ़ रहे है?
  5. क्या आप भी एक आग अपने दिल में संजोए घूम रहे है?
  6. क्या आप भी मिमियाने की बजाय शेर दहाड़ कर रहे है?

अगर हां तो आप भी शेर है!

मुबारक हो आप शेर है और इस पूरे विश्व के राजा, मुबारक हो आप अपनी नियति खुद बना रहे, मुबारक हो आप ही है असली विश्व विजेता सिकंदर ।
तो उठो अपने सपनों से जी चुराकर भागो मत बल्कि उसके पीछे शेर की तरह भागो, फेलियर के दर से मिमियाओ मत बल्कि अपनी जीत की उद्घोषणा की दहाड़ करो, आसान है!

पद्मावती विवाद पर राजपूतों पर प्रश्न उठाने वालो के लिए खुला पत्र 

                                       आहत हिन्दू के विचार

पिछले कुछ दिनों से देख रहा हूँ, पद्मावत फ़िल्म की आड़ में राजपूत राजाओं पर प्रश्न खड़ा करने और उन्हें कायर कहने वाले बुद्धिजीवी कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। अद्भुत अद्भुत प्रश्न गढ़े जा रहे हैं। राजपूत वीर थे तो हार क्यों जाते थे? राणा रतन सिंह योद्धा थे तो उनकी पत्नी को आग लगा कर क्यों जलना पड़ गया? स्वघोषित इतिहासकार यहां तक कह रहे हैं कि सल्तनत काल के राजपूत शासक इतने अकर्मण्य और कायर थे कि मुश्लिमों का प्रतिरोध तक नहीं कर सके।

सोचता हूँ, क्या यह देश सचमुच इतना कृतघ्न है कि राजपूतों को कायर कह दे? सन 726 ई. से 1857 ई. तक सैकड़ों नहीं हजारो बार, सामने हार देखने के बाद भी लाखों की संख्या में मैदान में उतर कर शीश चढ़ाने वाले राजपूतों पर यदि हम प्रश्न खड़ा करें, तो हमें स्वयं सोचना होगा कि हम कितने नीचे गिर चुके हैं।
आप कहते हैं वे हारे क्यों? श्रीमान, शिकारी और शेर के युद्ध मे शिकारी लगातार जीतता रहा है, तो क्या इससे शेर कायर सिद्ध हो गया? नहीं श्रीमान! शेर योद्धा होता है, और शिकारी क्रूर। राजपूत योद्धा थे, और अरबी आक्रमणकारी क्रूर पशु। राजपूतों के अंदर मनुष्यता थी, तुर्कों के अंदर रक्त पीने ही हवस। वहशी कुत्ते तो बड़े बड़े बैलों को काट लेते हैं, तो क्या बैल शक्तिहीन सिद्ध हो गए?
और यदि सच मे आपको लगता है कि तुर्कों, अरबों के सामने राजपूत बिल्कुल भी प्रभावी नहीं रहे, तो आप दुनिया की अन्य प्राचीन सभ्यताओं की ओर निगाह फेरिये, और खोजिए कि मिस्र के फराओ के वंसज कहाँ हैं? ढूंढिए कि मेसोपोटामिया की सभ्यता क्या हुई। पता लगाइए कि ईरान के सूर्यपूजक आर्य अब क्या कर रहे हैं।
श्रीमान! इस्लाम का झंडा ले कर अरब और तुर्क जहां भी गए, वहां की सभ्यता को चबा गए। वो राजपूत ही थे, जिनके कारण भारत बचा हुआ है। उन्होंने अपने सरों से तौल कर इस मिट्टी को खरीदा नहीं होता, तो आप अपने घर मे बैठ कर बुद्धिजीविता नहीं बघारते, बल्कि दाढ़ी बढ़ा कर यह तय कर रहे होते कि शौहर का अपनी बीवी को कितने कोड़े मारना जायज है।
आज एक अदना सा पाकिस्तान जब आपके सैनिकों का सर काटता है, तो आप बौखला कर घर मे बैठे बैठे उसको गाली देते और अपनी सरकार को कोसते रह जाते हैं। तनिक सोचिये तो, भारतीय राजाओं से मजबूत सैन्य उपकरण(बारूद और तोप वही ले कर आये थे), अपेक्षाकृत अधिक मजबूत और तेज घोड़े, और ध्वस्त कर देने का इरादा ले कर आने वालों के सामने वे सैकड़ों बार गए और शीश कटने तक लड़ते रहे, इसके बाद भी जब आप उनपर प्रश्न खड़ा करें तो क्या साबित होते हैं आप?
आपको जौहर अतार्किक लगता है तो यह आपकी दिक्कत है भाई, पर अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए आग में जल जाने वाली देवियों के ऊपर प्रश्न खड़ा करने की सामर्थ्य नहीं आपकी, आप तो 40 डिग्री तापमान पर ही बिजली के लिए सरकार को गाली देने वाले लोग हैं। भाई , जलती आग में कूद जाने के लिए मर्द का नहीं, स्त्री का कलेजा चाहिए, और हार दिखा रहे युद्ध में भी कूद कर शीश कटा लेने के लिए राजपूत का कलेजा।
दूसरों की छोड़िये, जिन चंद राजपूत राजाओं को हम और आप मुगलों का समर्थन करने के कारण गाली देते और गद्दार कहते हैं, उनके पुरुखोंने भी बीसों बार इस राष्ट्र के लिए सर कटाया था। आज भी किसी राजपूत लड़के के खानदान का पता कीजिये, मात्र तीन से चार पीढ़ी पहले ही उसके घर में कोई न कोई बलिदानी मिल जाएगा।

घर मे बैठ कर तो किसी पर भी उंगली उठाई जा सकती है बन्धु, पर राजपूत होना इस दुनिया का सबसे कठिन काम है। कलेजे के खून से आसमान का अभिषेक करने का नाम है राजपूत होना। तोप के गोले को अपनी छाती से रोकने के साहस का नाम है राजपूत। आप जिस स्थान पर रहते हैं न, पता कीजियेगा उस जगह के लिए भी सौ पचास राजपूतों ने अपना शीश कटाया होगा.. छोड़ दो डार्लिंग, तुमसे न हो पायेगा!
…..जय हिन्द जय राजपूताना

भारतीय लोकतंत्र का भविष्य?

                                             जोगराजसिंह भाटी

संपूर्ण प्रभत्व संपन्न लोकतान्त्रिक भारत ने इस 26 जनवरी को अपना 69 वां गणतंत्र दिवस मनाया। हमारा भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश है यह अभिमान का नही बल्कि हमारी श्रेष्ठता का प्रतीक है। विश्वगुरु का दर्जा प्राप्त यह भारत जिसे समूचा विश्व आज सम्मान और उम्मीद की दृष्टि से देख रहा है लेकिन इसी भारत के बुद्धिजीवियो के अनुसार इस महान देश का लोकतंत्र खतरे में हे । क्या वाकई ?    क्या हमारा लोकतंत्र इतना कमजोर है ?  इस देश में एक दलित बालक जिसे स्कूल में पढ़ने का भी समान अवसर नही दिया गया वो आगे चलकर इस देश का संविधान बना गया , ट्रैन में अखबार बेचने वाला एक मुश्लिम गरीब बालक आगे चलकर मिसाइल मेन बना और भारत के सर्वोच्च  राष्ट्रपति पद को सुशोभित किया , इसी देश में एक चायवाला भारत का प्रधानमंत्री बना । यह सब इस देश के लोकतंत्र से ही तो संभव है और इसी कारण विश्व में हम सम्मान की दृष्टि से देखे जाते हे । यह देश वसुधेव कुटुम्बकम की धारणा वाला देश हे , यह वो देश है जो अपनी मिटटी को माँ का दर्जा देता है । हमारी संस्कृति हमारे उसूल , हमारे संस्कार आह अद्वितीय और गौरवपूर्ण ।    लेकिन क्या हम यह कायम रख पाएंगे । वर्तमान समय अब दोराहो पे खड़ा है एक रास्ता वो जो उनत्ति की और ले जायेगा और दूसरा  रास्ता विनाश का सूचक है । 

लोकतंत्र के 4 स्तम्भ कार्यपालिका , व्यवस्थापिका , न्यायपालिका , मीडिया जब यह चारो अपना काम ईमानदारी से करेंगे तभी देश चलेगा । वर्तमान परिवेक्ष में कार्यपालिका और व्यवस्थापिका एक ही थैली के चट्टे बट्टे हे यह वही लोग हे जिन्हें हम जाति और मजहब आधारित चुनते हे और बदले में आपको यह घोटाले देते है । हालाँकि इस गंदी राजनीति पर मुझे ना तो कभी विश्वास था ना ही में टिप्पणी करूंगा। हालाँकि बीजेपी पे कुछ विश्वास हुआ था लेकिन देश को भगवामय करने के चक्कर में वह अपना वजूद भूल गयी।   भ्रस्टाचार मूद्दे पर सत्ता में आयी आम आदमी पार्टी खुद इसी में डूब गयी। वो कहते हे ना कि सत्ता का लोभ ही कुछ ऐसा हे इससे बचना संभव ना।  देश में जाति आधारित बाँट कर अपना उल्लू सीधा करने वाली यह पार्टियां आगे चलकर ऐसे हालात पैदा करेगी की यह देश गृहयुद्ध में बर्बाद हो जायेगा।। 

हम सब की आस्था का केंद्र न्यायपालिका खुद अब संदेह के घेरे में हे । न्यायपति खुद जब जनता से न्याय मांगने लगे है । लोकतंत्र को बचाने वाली संस्था खुद कह रही है लोकतंत्र खतरे में हे , यह क्या हालात हे अभी तो समझ नही आएंगे पर बाद में इसके वृहद् परिणाम सामने आएंगे।

एक फिल्म पर हुए घमासान ने इस देश की पोल खोल के रख दी , सेंसर बोर्ड पे विश्वास कब का उठ चुका जब अर्धनग्न फिल्मों को पास कर भारतीय संस्कृति को धूमिल करने लगा।  फिल्में समाज को आइना दिखाती है , हम उनका अनुसरण भी करते हे इसीलिये यहाँ सेंसर बोर्ड का महत्वपूर्ण काम होता है । लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने भी एक ऐसी फिल्म के पक्ष में फैसला लिया जो करोडो लोगो की आस्था पे चोट करती है । क्या सुप्रीमकोर्ट करोडो लोगो की भावनाओं से ज्यादा महत्वपूर्ण एक फिल्म को मानता है। वास्तव में यह दुर्भाग्यपूर्ण है , जिस अभिव्यक्ति की आड़ में यह खेल हो रहा है वो आखिर हे क्या? संविधान में  स्वतंत्रता के अधिकार में अभिव्यक्ति की आजादी भी हे लेकिन उसकी कुछ सीमायें भी हे , यह आजादी छिन जाती है जब देश की अखंडता एकता को खतरा हो या किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचे , मानहानि हो यहाँ यह सब हुआ लेकिन यह फिल्म बैन ना हुई ,आखिर जज भी इस देश के वातावरण में रहते है असर तो होगा ही। 

जब देश के यह तीनो स्तम्भ काम ना करे तो सबसे बड़ी जिमेदारी वहां मीडिया की होती है लेकिन हमारा मीडिया तो मजाक बना हुआ है । कमाई का जरिया यहाँ तो दुकाने खुली हे , जो चाहा दिखा दो , जैसा चाहे दिखा दो। न्यूज़ तो यह खुद बनाते हे इनकी ब्रेकिंग न्यूजे की देश को ब्रेक कर रही । पद्मावती फिल्म पे मीडिया इतना हाइपर हो गया जैसे पद्मावती रिलीज ना हुई तो इनकी साँस रुक जाएगी। आखिर फिल्म रिलीज हुई देश का एक बड़ा वर्ग इंस देश में अपनी आस्था के प्रतीक , और देश की महिलाओं के स्वाभिमान की प्रतीक पद्मावती का सम्मान भी नहीं बचा पाया। यही घटनाएं ही तो करनी सेना जैसे संगठनों के निर्माण को मजबूर करती है । देश में कई जातियो के कई संगठन हे जिन्हें राजनीतिक फायदे हेतु बढ़ावा दिया जाता है लेकिन कई देशों में हुई घटनाओं पे नजर डाले तो जहाँ भी नागरिकों को उनके अधिकार नही मिले वहां उन लोगो ने छीने हे । भविष्य में जातीय संगठनों में टकराव होगा परिणामस्वरूप गृह युद्ध । इस देश में फिल्म लो सुरक्षा दी जाती है लेकिन इस देश में तिरंगा रैली निकलने और भारत माता की जय लगाने वाले को गोली मार दी जाती है , ऐसे हालात पहले तो सिर्फ कश्मीर में थे अब उत्तरप्रदेश की यह घटना है ।     देशविरोधी नारे लगाने वाले खुले आप घूम रहे लेकिन भारत माता की जय वाला अब इस दुनिया में नही है । आप लोग कल्पना कर लीजिए अपने भविष्य के बारे में क्योंकि हालात बहुत तेजी से बदल रहे ।

खेर यह दिन अभी थोड़ा दूर है फ़िलहाल आप लोकतंत्र का लुफ्त उठाइये। 

जय हिंद , जय भारत